पचौली




श्रेणी (Category) : सगंधीय
समूह (Group) : वनज
वनस्पति का प्रकार : शाकीय
वैज्ञानिक नाम : पोगोस्टेमोंन केबिन
सामान्य नाम : पचौली

उपयोग :
 पचौली तेल का उपयोग बड़े पैमाने में मादक और गैर मादक पदार्थों जैसे केन्डी, दूध से बनी मिठाई, वेक्ड पदार्थ में संघटक के रूप में किया जाता है।
 इसका उपयोग साबुन, इत्र, बाँडी लोशन, सेविंग लोशन, डिटर्जेंट, तंबाखू और सुंगध में भी किया जाता है।
 पचौली की ताजी पत्तियों का काढ़ा बनाकर उपयोग किया जाता है।
उपयोगी भाग :
 पत्तियाँ
उत्पादन क्षमता :
 2 टन/हे. सूखी पत्तियाँ और 50-60 कि.ग्रा./हे. तेल
उत्पति और वितरण :
यह मूल रुप से फिलीपिन्स का पौधा है। पचौली का पौधा मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर में जंगली रूप से बढ़ता है। यह प्राकृतिक रूप से पैरग्वे, पैनांग, वेस्टइंडीज में फैला हुआ है। यह पौधा भारत में 1942 में टाटा ऑयल मिल्स के द्दारा प्रस्तुत किया गया था।
वितरण : पचौली पुदीना जाति का झाड़ीदार शाकीय पौधा है। इससे प्राप्त तेल के लिए इसकी खेती की जाती है। पचौली तेल का उपयोग बड़े पैमाने में संघटक के रूप में किया जाता है। पचौली तेल को चंदन तेल के साथ मिलाने पर सर्वश्रेष्ठ अत्तर प्राप्त होता है।


कुल : लेमीऐसी
आर्डर : लेमीलेस
प्रजातियां :
 पोगोस्टेमान पचौली पैलेट
वितरण :
पचौली पुदीना जाति का झाड़ीदार शाकीय पौधा है। इससे प्राप्त तेल के लिए इसकी खेती की जाती है। पचौली तेल का उपयोग बड़े पैमाने में संघटक के रूप में किया जाता है। पचौली तेल को चंदन तेल के साथ मिलाने पर सर्वश्रेष्ठ अत्तर प्राप्त होता है।

स्वरूप :
 पचौली एक उर्ध्व, शाखित और रोमिल शाकीय पौधा है।
 इसका तना घना, रोऐदार और गांठो पर फूला हुआ होता है।
पत्तिंया :
 पत्तियाँ आयताकार मोटी, एक या दोहरी दाँत वाली और सतह पर घनी रोऐदार होती है।
फूल :
 फूल जनवरी से फरवरी माह में आते है।
 बाह्यदलपुंज 5-6.5 मिमी के होते है।
परिपक्व ऊँचाई :
 यह 0.5 से 1.0 मीटर तक की ऊँचाई तक उगता है।
 बुवाई का समय (Sowing-Time)
जलवायु :
 पचौली एक गर्म आर्द्र जलवायु पसंद करता है।
 यह 150-300 से.मी. वार्षिकी वर्षा वाले क्षेत्रो में अच्छी तरह पनपता है।
 24-28 0C तापमान और औसत 75% आद्रता पौधे के लिए आदर्श मानी जाती है।
 समुद्र तल से 800 से 1050 मीटर की ऊँचाई पर इसे सफलतापूर्वक उगया जा सकता है।
भूमि :
 यह शख्त पौधा है और इसे विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है।
 खाद और पोषक तत्वों के साथ दोमट मिट्टी अनुकूलतम तेल उत्पादन के लिए सर्वोत्तम होती है।
 मिट्टी का pH मान 5.5 – 6.2 होना चाहिए।
मौसम के महीना :
 बारिश के मौसम में इसकी बुबाई की जाती है।
भूमि की तैयारी :
 बुबाई के पहले मुख्य खेत को अच्छी तरह से जोतकर तैयार किया जाता है।
 मेड और लकीरें बनाकर खेत को छोड़ दिया जाता है।
 मेड 20-25 से.मी. ऊँची और 18-20 से.मी. चौड़ी होना चाहिए।
 कतार से कतार के बीच की दूरी 60 से.मी. रखी जाती है।
फसल पद्धति विवरण :
 कलमों को मुख्य खेतो में सीधे रोपित किया जा सकता है।
 19-20 से.मी. लंबी कलमों की आवश्यकता होती है।
 अच्छी फसल के लिए रोपण बिन्दु पर 2-3 कलमों का रोपण करते है।
 प्रारंभिक चरण के दौरन आंशिक छाया और पर्याप्त नमी आवश्यक होती है।
रोपाई (Transplanting) :
 मुख्य खेत में जड़वत कलमों को 60X60 से.मी. की दूरी पर रोपण करते है।
 अगस्त – अक्टूबर माह में रोपण करने से 90% तक प्रतिस्थापन मिलता है।

नर्सरी बिछौना-तैयारी (Bed-Preparation) :
 अच्छी तरह से गर्म रेत को पालीथीन के थैलो में भरा जाता है। जिसे एक घंटे तक भाप पारित करके बनाया जाता है।
 नर्सरी के लिए छाया आवश्यक होती है और वर्ष में किसी भी समय नर्सरी को लगाया जा सकता है।
 9 महीने पुरानी 10-12 से.मी. लंबाई की कलम जिसमें 4-5 गांठे होती है और 2-3 पत्तियाँ मुकुट के समान निकली होती है, वे नर्सरी के लिए उपयुक्त होती है।
 कलमों को नर्सरी बेड में पालीथीन थैलों में लगाया जाता है।
 आंशिक छाया और नियमित रूप से पानी जल्दी अंकुरण के लिए आवश्यक होते है।
 रोपण के 10 दिनों के पहले ही पौधे को छाया से हटा देना चाहिए।
 कलम लगभग 8-10 सप्ताह में रोपण के लिए तैयार हो जाती है।
 अंकुरण को शीघ्र बढ़ाने के लिए कलमो को उनेक आधार पर 1500 PPM IBA द्दारा उपचारित किया जाता है।
रोपाई की विधि :
 जड़वत कलमों को मुख्य खेत में 60X60 से.मी. की दूरी पर प्रतिरोपित किया जाता है।
 अगस्त – अक्टूबर रोपण के लिए आदर्श होते है।

(1)
कीट : मेलाईडोज्नी इनकगनिटा एंड एम. हपला (जड़ ग्रंथि सूत्रकृमि )
पहचानना :
 सूत्रकृमि पौधों की जड़ो से प्रवेश करते है।
 अत्याधिक संक्रमित पौधों का विकास शीर्ष से रूक जाता है।
 रोग ग्रसित पोधों में विशिष्ट लक्ष्ण 8 महीने के बाद ही दिखाई देते है।
नियंत्रण :
 सूत्रकृमि से मुक्त नर्सरी तैयार करना चाहिए।
 भूखंड को 20 कि.ग्रा./हे. फ्यूराडन से उपचारित करना चाहिए।
 पहली खुराक रोपण के पूर्व देना चाहिए और दूसरी खुराक रोपण के एक वर्ष के बाद देना चाहिए।
 रोग प्रबंधन (Disease Management)
(1)
रोग : आल्टरनेरिया आल्टरनेटा (पर्ण अंगमारी )
पहचान करना-लक्षण :
 यह रोग पत्तियों के शीर्ष भाग या किनारों के समीप भूरे धब्बों के रूप में दिखाई देता है।
 धब्बे अनियमित रूप से बढ़कर पत्तियों को सुखा देते है।
कारणात्मक जीव (Causal-Organisms) :
सरकोस्पोरा स्पी.
नियंत्रण :
 एक महीने के अंतराल में 0.5% डिथाइन Z-78 को दो बार छिड़काव करके इसे नियत्रित किया जा सकता है।
 उत्पादन प्रौद्योगिकी खेती (Farming Production Technology)
खाद :
 मुख्य खेत में तैयारी के दौरान लगभग 12 टन/हे. की दर से FYM मिलाया जाता है।
 फसल मैंगनीज की कमी के लिए संवेदनशील होती है जिसे 5.5 से 11 किग्रा/हे. की दर से MnSO4 के छिड़काव द्दारा कम किया जाता है।
 रोपण के समय यूरिया, सुपर फास्फेट और पोटाश के लवण के रूप में 25 कि.ग्रा. N, 50 कि.ग्रा. P2O5 और कि.ग्रा. K2O की मात्रा प्रति हे. की दर से दी जाती है।
 प्रत्येक कटाई के बाद नाइट्रोजन की खुराक देना चाहिए।
 कुल 150 कि.ग्रा./हे./वर्ष नाइट्रोजन की मात्रा फसल को देना चाहिए।
सिंचाई प्रबंधन :
 रोपाई के बाद सिंचाई 3-4 दिन तक करनी चाहिए और इसके बाद 10-15 दिनों में सिंचाई की जाती है।
 पचौली को एक समान वर्षा की आवश्यकता होती है इसलिए जहाँ वर्षा अल्प होती है, फसल की अच्छी पैदावार के लिए कृत्रिम सिंचाई की जाती है।
घसपात नियंत्रण प्रबंधन :
 रोपाई के लगभग 6 सप्ताह बाद निंदाई की आवश्यकता होती है।
 शुरु के 2-3 महीने खेत को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए।
 2 या 3 कि.ग्रा./हे. की दर से ड्युरान का छिड़काव करके खरपतवार को नियंत्रित किया जा सकता है।

 कटाई (Harvesting)
तुडाई, फसल कटाई का समय :
 रोपाई के लगभग 5 महीने के बाद पहली कटाई की जाती है।
 कटाई तब की जाती है, जब पत्तियाँ हरे रंग से भूरे रंग में परिवर्तित हो जाती है।
 फसल की कटाई एक छोटी और तेज कैंची की मदद से की जाती है।
 फसल की कटाई अपरिपक्व अवस्था में नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से कम उपज और तेल की निम्नगुणवत्ता प्राप्त होती है।
 स्थानीय परिस्थितियो की निर्भरता के आधार पर 3-4 महीने के बाद अगली कटाई की जा सकती है।
 फसल को 3 साल तक बरकरार रखा जा सकता है।
सुखाना :
 काटी गई सामग्री को पतली परत बिछाकर छाया में सुखाया जाता है।
 सूखने लिए सामान्य रूप से तीन दिन लगाते है।
 पूरी तरह से सूखी गई सामग्री को आसवन के लिए भेजा जाता है।
आसवन (Distillation) :
 भाप आसवन के द्दारा सूखी पत्तियों को आसवित करके पचौली तेल को प्राप्त किया जाता है।
 सूखी पत्तियों को तुरंत आसवित कर सकते है या सुविधा के अनुसार कुछ समय के लिए भंडारित कर सकते है।
भडांरण (Storage) :
 शुध्द तेल को साफ और सूखे एल्युमिनियम के बर्तनों में भंडारित करते है, जो कि किसी भी रसायन और दुर्गंध से मुक्त हो।
 वायुरोधी बर्तनों में तेल किनारों तक भरते है, अन्यथा हवा तेल की गुणवत्ता खराब कर देती है।
 बर्तनों को बंद करने के लिए धातु के कार्क का उपयोग करना चाहिए।
 तेल से भरे बर्तनों को ठंडे स्थान में रखा जाता है।
परिवहन :
 समान्यत: किसान अपने उत्पाद को बैलगाडी या ट्रेक्टर के द्दारा पहुँचाता है।
 दूरी अधिक होने पर उत्पाद को ट्रको या लारियों के द्वारा बाजार तक पहुँचाया जाता है।
 परिवहन के दौरान चढ़ाते एवं उतारते समय पैकिंग अच्छी होने के कारण फसल खराब कम होती है।
अन्य-मूल्य परिवर्धन (Other-Value-Additions) :
 पचौली तेल
इस विषय पर किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए आप कॉल कर सकते है  8235862311
औषधीय खेती विकास संस्थान 
www.akvsherbal.com
सर्वे भवन्तु सुखिनः 

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