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चिया की खेती के सम्बन्ध में वीडियो 

 

कलौंजी की खेती के कुछ वीडियो 

 

अजवाइन की खेती

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                                                                           अजवाइन की खेती  यह धनिया कुल (आबेलीफेरा) की एक महत्वपूर्ण मसाला फसल है। इसका वानस्पतिक नाम टेकिस्पर्मम एम्मी है तथा अंग्रेजी में यह बिशप्स वीड के नाम से जाना जाता है। इसके बीजों में 2.5-4% तक वाष्पशील तेल पाया जाता है।अजवाइन(celery seed )खजीज तत्वों का अच्छा स्रोत हैं। इसमें 8.9% नमी, 15.4% प्रोटीन, 18.1% वसा, 11.9% रेशा, 38.6% कार्बोहाइड्रेट, 7.1% खनिज पदार्थ, 1.42% कैल्शियम एवं 0.30% फास्फोरस होता हैं। प्रति 100 ग्राम अजवाइन से 14. 6मी.ग्रा. लोहा तथा 379 केलोरिज मिलती हैं।   औषधीय गुण अजवाइन के पौधे के प्रत्येक भाग को औषधी के रूप में काम में लाया जाता हैं। अजवाइन पेट के वायुविकार, पेचिस, बदहजमी, हैजा, कफ, ऐंठन जैसी समस्याओं और सर्दी जुखाम आदि के लिए काम में लिया जाता हैं, तथा गले में खराबी, आवाज फटने, कान दर्द...

काली हल्दी या नरकचूर याक

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काली हल्दी Black Turmeric का पौधा दिखने में केले के समान होता है  काली हल्दी या नरकचूर याक औषधीय महत्व का पौधा  है | जो कि बंगाल में वृहद् रूप से उगाया जाता है | इसका उपयोग रोग नाशक व सौंदर्य प्रसाधन दोनों  रूपों में किया जाता है | वानस्पतिक नाम curcuma cacia व अंग्रेजी में ब्लेक जे डोरी भी कहते हैं  | यह जिन्नी विरेसी कुल का सदस्य है , इसका पौधा तना रहित 30 – 60 से.मी. ऊँचा होता है | पत्तियां चौड़ी गोलाकार उपरी स्थल  पर नील बैंगनी रंग की मध्य शिरा युक्त होती है | पुष्प गुलाबी किनारे की ओर रंग के शपत्र लिए होते हैं | राइजोम बेलनाकार गहरे रंग के सूखने पर कठोर किस्टल बनाते हैं | राइजोम का रंग कालिमा युक्त होता है| काली हल्दी उपयुक्त जलवायु :- इसकी खेती के लिए उपयुक्त जलवायु उष्ण होती है | तापमान 15 से 40 डिग्री सेन्टीग्रेट होना चाहिए | काली हल्दी हेतु  भूमि की तैयारी :-  दोमट, बलुई, मटियार प्रकार की भूमि में अच्छे से उगाई जा सकती है | वर्षा के पूर्व जून के प्रथम सप्ताह में 2 – 4 बार जुताई करके मिट्टी  भुरभुरी बना लें तथा जल निकासी की व्यवस्था करलें |...

कैमोमाइल की खेती

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कैमोमाइल की खेती हर्बल-टी आज नए ज़माने की चाय है। इसका बाज़ार अंतरराष्ट्रीय हो चुका है। बाज़ार में तरह तरह की Herbal Tea मिल रही हैं जिसमें कई तरह की जड़ी-बूटियां, फूल, वनस्तियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। खास बात ये है कि उत्तराखंड के प्रगतिशील किसान भी हर्बल खेती पर ज्यादा ज़ोर देने लगे हैं। इन्हीं में से कुछ किसानों ने हर्बल टी की चुस्कियों को अपनी तरक्की का जरिया बना लिया। वैसे तो ये फूलों की खेती है। विदेशों में इस फूल को कैमोमाइल टी के नाम से जाना जाता है। इस फूल (चाय) की खेती उत्तराखंड में कई जगह हो रही है। इसके नतीजे लाजवाब आए तो दूसरे किसानों ने भी इसे अपनाना शुरू कर दिया। अब उत्तराखंड के कई किसान इस कैमोमाइल की खेती से मुनाफा कमाने में जुट गए हैं। कैमोमाइल के फूलों से चाय की पत्ती तैयार होती है। बाद में परिपक्व फूलों से ही Chamomile Oil / कैमोमाइल तेल निकाला जाता है। कैमोमाइल तेल आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने के काम आता है। कैमोमाइल एक नगदी फसल है। Chamomile Oil बाजार में 60 से 90 हजार रुपये लीटर तक बिकता है। यही नहीं इसके बीज बेचकर भी किसान मुनाफा कमाया जा सकता हैं। दुनि...

कलौंजी (Nigella sativa)

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Nigella Seeds (कलौंजी) कलौंजी (Nigella sativa) को  "Black Cumin" Kalonji  भी कहा जाता है, छोटे काले Kalonji बीज झाड़ियों पर होते है।  जो व्यापक रूप से मध्य भारत में उगाया जाता है। कलौंजी रनुनकुलेसी कुल का झाड़ीय पौधा है, जिसका वानस्पतिक नाम “निजेला सेटाइवा” है, कलौंजी को देश के विभिन्न भागो में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। इसे मुख्य तौर पर इसके बीजों के लिए उगाते है    जिनका प्रयोग मसाला के रूप में अचार में ,बीजो तथा उनसे तैयार तेल का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं में तथा सुगंध उद्योग में भी किया जाता है। जलवायु: कलौंजी एक ठंढी जलवायु की फसल है। इसे मुख्यता उत्तरी भारत में सर्दी के मौसम में रबी में उगाया जाता है इसकी बुआई व बढवार के समय हल्की ठंठी तथा पकने के समय हल्की गरम जलवायु की जरूरत पड़ती है। भूमि: कलौंजी को जीवांश युक्त अच्छे जल निकास वाली सभी प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है। दोमट व बलुई भूमि कलौंजी की फसल उत्पादन के लिए अधिक उपयुक्त है। उचित जल निकास प्रबंध द्वारा इस फसल को भारी भूमि में भी उगाया जा सकता है।  खेत क...

*सर्पगन्धा/शतावरी  की नर्सरी तैयार करने की विधि*

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*सर्पगन्धा की नर्सरी तैयार करने की विधि* 1.सबसे पहले खेत की अच्छी गहरी जुताई कर लेना चाहिए  उसके बाद उसमे खाद गिरवा कर मिलवा देना चाहिए। फिर मिट्टी को बारीक करवाना होता है। 2. जुताई करवाने के बाद उसमे पुनः खाद मिलवाया जाता है। 3.चित्र क्रमांक 3 के अनुसार बेड का निर्माण किया जाता है और  बेड  को पानी लगा कर गिला कर लेना चाहिए जिससे कि उसमे भीतर तक नमी बनी रहे। (पानी आप अंत मे भी लगा सकते है।) 4.बेड पर आधा इंच गहरा और 2 इंच के अंतर पर हल्की लाइन बनाई जाती है। 5. उन्ही लाइनों में बीज़ ( 2 -2 इंच की दूरी पर ) रखा जाता है। 6.बीज़ रखने के बाद उसे  रेत मिट्टी और खाद से भर देना चाहिए। 7.उसके बात बेड को पुआल से ढक कर पानी लगा देना चाहिए। *बीजोपचार*:- बीज़ की बोआई से पहले एक रात के लिए भिगो कर रख दें। सुबह उसी पानी मे 5% नमक मिला कर 2 घण्टे के।लिए बीज़ को पुनः भीगे रहने दे। बीज को निकल कर २ से ३ दिन तक जुट की बोरियो के ऊपर फैला दें और फिर ऊपर से भी एक जुट की बोरी से ढँक दें ,और ऊपर से पानी का छिड़काव हल्का हल्का करते रहे ! छिड़काव मात्र नमी बन...